अब्दुल्लाह मंसूर
आजकल वक़्फ़ (संशोधन) विधेयक 2024को लेकर समाज में एक बड़ी गलतफहमी फैल रही है. लोग डर रहे हैं कि यह नया कानून मस्जिदों, कब्रिस्तानों और मुस्लिम समाज की दूसरी पवित्र जगहों पर सरकार का कब्ज़ा करवाने का तरीका है.
सोशल मीडिया पर अफवाहें ज़ोर-शोर से चल रही हैं. कोई कह रहा है कि "मस्जिदें खतरे में हैं", तो कोई बोल रहा है कि "कब्रिस्तानों को तोड़ दिया जाएगा". ये बातें सुनकर लोगों के दिल में डर बैठ गया है और गुस्सा भी बढ़ रहा है.
इस वजह से समाज में नफरत और बंटवारे का खतरा पैदा हो रहा है. यह लेख खास तौर पर इसी गलतफहमी को दूर करने के लिए लिखा गया है. हमारी कोशिश है कि सही जानकारी देकर इस डर और असंतोष को खत्म किया जाए, ताकि आपसी भाईचारा और अमन बना रहे.
वक़्फ़ (संशोधन) विधेयक 2024को अगस्त 2024में लोकसभा में पेश किया गया था. अभी यह संसद की संयुक्त समिति (JPC) के पास है, जो इस पर चर्चा कर रही है. सरकार का कहना है कि यह पुराने वक़्फ़ कानून 1995में सुधार लाने के लिए है.
इसका मकसद वक्फ़ की ज़मीनों को बेहतर तरीके से चलाना, उसका गलत इस्तेमाल रोकना, और गरीब पसमांदा मुस्लिमों, औरतों, और बच्चों को फायदा पहुँचाना है. लेकिन कुछ लोग इसे सरकार की "चाल" मान रहे हैं. आइए, इसके बड़े प्रावधानों को समझें, अफवाहों को देखें, और सच को परखें.
पहला प्रावधानः वक़्फ़ बाय यूज़र' हटाना
प्रावधान क्या है?
पहले अगर कोई जगह मस्जिद, कब्रिस्तान, या मदरसा सालों से वक़्फ़ के तौर पर इस्तेमाल हो रही थी, तो उसे बिना कागज़ात के भी वक़्फ़ मान लिया जाता था. इसे 'वक्फ़ बाय यूज़र' कहते थे. नए कानून में यह नियम हटाया जा रहा है. अब हर वक़्फ़ जगह के लिए सही कागज़ात (वक्फ़नामा) दिखाना जरूरी होगा.
अफवाह क्या है?
लोग कह रहे हैं कि इसकी वजह से पुरानी मस्जिदें और कब्रिस्तान खतरे में पड़ जाएँगे. उनका डर है कि जिन जगहों के पास कागज़ात नहीं हैं, उन्हें सरकार अपने नाम कर लेगी या तोड़ देगी.
सच क्या है?
अगर कोई मस्जिद या कब्रिस्तान पहले से वक्फ़ बोर्ड में दर्ज है और उसके पास कागज़ात हैं, तो उसे कोई परेशानी नहीं होगी. जिनके पास कागज़ात नहीं हैं, उनकी जाँच होगी. अगर वह जगह सरकारी ज़मीन पर बनी हो, तो कोर्ट में मामला जा सकता है.
यह कब्जे का सीधा रास्ता नहीं है. पहले भी ऐसी जगहों के झगड़े कोर्ट में सुलझते थे. नया कानून बस यह कह रहा है कि बिना कागजात के वक़्फ़ का दावा नहीं चलेगा.
मिसाल के तौर पर, अगर कोई मस्जिद 100साल पुरानी है, लेकिन उसके पास कागज़ात नहीं हैं और वह सरकारी जमीन पर है, तो उसकी जाँच होगी. लेकिन यह नया कानून लागू होने से पहले भी होता था.
दसरा प्रावधानः जिला कलेक्टर की जाँच
प्रावधान क्या है?
नए कानून में जिला कलेक्टर को यह हक दिया गया है कि वह जाँच करे कि कोई ज़मीन वक़्फ़ की है, सरकारी है, या किसी और की. यह जाँच तब होगी जब कोई नई जमीन वक़्फ़ में दर्ज करवाने की कोशिश करेगा या पुरानी जगह का झगड़ा होगा.
अफवाह क्या है?
लोगों को लग रहा है कि कलेक्टर को इतना हक देने से वह मनमानी करेगा. कुछ कह रहे हैं कि कलेक्टर मस्जिदों और कब्रिस्तानों को सरकारी जमीन बताकर उन पर कब्जा कर लेगा.
सच क्या है?
कलेक्टर का काम सिर्फ जाँच करना है, कब्ज़ा करना नहीं. अगर उसका फैसला गलत लगे, तो लोग हाई कोर्ट जा सकते हैं-यह हक कानून में दिया गया है.
पहले भी वक़्फ़ ट्रिब्यूनल और कोर्ट ऐसी जाँच करते थे. अब कलेक्टर को यह काम सौंपा जा रहा है ताकि जल्दी फैसला हो सके.
मिसाल के लिए, अगर कोई कब्रिस्तान सरकारी जमीन पर बना है और उसका कोई कागज़ नहीं है, तो कलेक्टर जाँच करेगा. लेकिन वह खुद कब्जा नहीं करेगा यह कोर्ट तय करेगा.यह प्रावधान गलत इस्तेमाल रोकने के लिए है, न कि मस्जिदों को हड़पने के लिए.
तीसरा प्रावधानः गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति
प्रावधान क्या है?
वक्फ़ बोर्ड में अब गैर-मुस्लिम लोग और औरतें भी शामिल होंगी. पहले बोर्ड में ज्यादातर मुस्लिम लोग ही होते थे.
अफवाह क्या है?
कुछ लोगों को लगता है कि गैर-मुस्लिम लोग बोर्ड में आएँगे तो वक्फ़ की जगहों पर गलत फैसले होंगे. उनका डर है कि इससे मस्जिदों और कब्रिस्तानों पर खतरा बढ़ेगा.
सच क्या है?
बोर्ड का काम जमीनों का हिसाब-किताब रखना और उनके इस्तेमाल को देखना है.
गैर-मुस्लिम लोग इसमें होंगे तो भी वे कानून के दायरे में काम करेंगे.
इससे मस्जिदों या कब्रिस्तानों पर सीधा कब्ज़ा नहीं होगा. यह सिर्फ बोर्ड की बनावट बदलने की बात है.
सरकार कह रही है कि इससे पारदर्शिता आएगी और बोर्ड का गलत इस्तेमाल रुकेगा.
चौथा प्रावधान: कोर्ट में अपील का हक
प्रावधान क्या है?
पहले वक्फ़ ट्रिब्यूनल का फैसला आखिरी माना जाता था. अब नए कानून में उसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जा सकती है.
अफवाह क्या है?
कुछ लोग कह रहे हैं कि यह सिर्फ दिखावा है, और सरकार कोर्ट के रास्ते भी बंद कर देगी.
सच क्या है?
यह प्रावधान लोगों के हक में है. अगर कलेक्टर या बोर्ड गलत फैसला लेता है, तो कोर्ट में उसकी जाँच हो सकेगी. इससे मस्जिदों और कब्रिस्तानों को बचाने का रास्ता मज़बूत हुआ है, कमजोर नहीं.
अफवाहें कहाँ से फैल रही हैं?
नेताओं की बातें: कुछ नेता इसे "मुस्लिम ज़मीन छीनने की साजिश बता रहे हैं, तो सरकार कह रही है कि यह "सुधार" है. दोनों तरफ से बढ़ा-चढ़ाकर बोला जा रहा है.
सोशल मीडिया: X (Twitter), Facebook और Whats App पर लोग बिना सच जाने डराने वाली बातें फैला रहे हैं. मिसाल के तौर पर, कोई लिख रहा है कि "सारी मस्जिदें तोड़ दी जाएँगी", जो बिल्कुल गलत है.
पुराना डरः पहले के कुछ विवाद जैसे अयोध्या की वजह से लोग सरकार पर शक करते हैं. यह शक अफवाहों को हवा दे रहा है.
सच का पूरा हाल
कब्ज़े की बात गलतः नए कानून में ऐसा कुछ नहीं लिखा कि सरकार मस्जिदों, कब्रिस्तानों, या मदरसों को अपने हाथ में लेगी. यह डर भावनाओं से फैला है, सच से नहीं.
थोड़ा खतराः जिन जगहों के पास कागज़ात नहीं हैं और वे सरकारी जमीन पर हैं, उनकी जाँच हो सकती है. लेकिन यह पहले भी होता था. नया कानून इसे साफ करने की कोशिश है.
कानूनी रास्ताः अगर कोई गलत फैसला होता है, तो कोर्ट में लड़ाई लड़ी जा सकती है. यह हक लोगों के पास है.
नफरत रोकने के आसान तरीके
सच बताएँ: सरकार और समाज के बड़े लोग मिलकर आसान भाषा में सच समझाएँ.
बातचीत करें: अभी संसद में चर्चा चल रही है. उसके नतीजे का इंतज़ार करें.
सोच-समझकर मानें: हर बात पर यकीन न करें. कानून के कागज़ात खुद देखें.
हमें लगता है कि "वक़्फ़ अमेंडमेंट मस्जिदों और कब्रिस्तानों पर कब्ज़े का रास्ता है" यह बात अभी पूरी तरह सच नहीं है. हाँ, कुछ जगहों की जाँच को लेकर थोड़ा डर हो सकता है, खासकर जहाँ कागज़ात नहीं हैं. लेकिन इसे बहुत बड़ा खतरा मानने के बजाय हमें सच पर ध्यान देना चाहिए.
यह कानून अभी बन रहा है, और इसका असली मतलब तभी पता चलेगा जब यह लागू होगा. हमारा मानना है कि अफवाहों से डरने के बजाय सही जानकारी लेनी चाहिए. समाज में अमन और भाईचारा बनाए रखना हम सबकी ज़िम्मेदारी है. तो चलिए, एक-दूसरे का साथ दें, सच को समझें, और शांति से आगे बढ़ें- यही हमारी कोशिश और दुआ है.