आवाज द वॉयस/ नई दिल्ली
तैयबा अफ़रोज़ ने कमर्शियल पायलट बनकर इतिहास रच दिया है. मुस्लिम लड़की एक साधारण परिवार से आती है. उसके पिता मोतीउल हक बिहार के सारण जिले के मढ़ौरा इलाके में राशन की दुकान चलाते हैं और उसकी माँ सैमसन निशा गृहिणी है.
ऐसी चुनौतियों के बावजूद, तैयबा कमर्शियल पायलट बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्पित रही. उसकी यात्रा 2019में शुरू हुई जब वह भुवनेश्वर में सरकारी विमानन प्रशिक्षण संस्थान में शामिल हुई. वहाँ उसने 200कठिन उड़ान घंटे दर्ज किए, तूफानों, मानसून और आत्म-संदेह से जूझते हुए.
तैयबा का प्रशिक्षण मैराथन था- 2-3साल की सैद्धांतिक परीक्षाएँ (DGCA के पेपर में 70%+ स्कोर करना), सिम्युलेटर अभ्यास और सुरक्षित लैंडिंग की कला में महारत हासिल करना.
वह याद करती है, “100घंटे तक अकेले उड़ान भरना डरावना था, लेकिन डर कभी मेरे दिमाग में नहीं आया.”
बाद में, 2023में, उसने इंदौर फ्लाइंग क्लब में 120घंटे का प्रशिक्षण पूरा किया. इन सबके बाद, तैयबा ने आखिरकार डीडीसीए से अपना लाइसेंस हासिल कर लिया. उन्हें कमर्शियल पायलट बनने का प्रमाणपत्र मिला और वे कोई भी कमर्शियल विमान उड़ा सकती हैं.
एक मुस्लिम महिला के रूप में, जो पायलट की वर्दी पहनती है, तैयबा को लोगों ने टोका: “क्या उसे बुर्का नहीं पहनना चाहिए?” इस पर, वह जवाब देती है: “कॉकपिट में कोई ड्रेस कोड नहीं है. विमान को आपके उपनाम से कोई मतलब नहीं है.”
एक पायलट का वेतन ₹1.5लाख से शुरू होता है,” लेकिन यह वह ट्रॉफी नहीं है जिसे तैयबा हासिल करना चाहती थी. उनकी असली उपलब्धि एक मुस्लिम लड़की होना है, जो बिहार के पिछड़े इलाके से आती है, एक कमज़ोर आर्थिक परिवार से आती है; उसने इन सभी मुश्किलों को झेला और सफलता के झंडे गाड़े. उसका संदेश है; “इस मुस्लिम लड़की को देखो, वह विमान उड़ा सकती है.”
तैयबा अफ़रोज़ सिर्फ़ एक पायलट नहीं हैं; वह हर उस मुस्लिम लड़की के लिए एक मिसाल हैं, जिन्हें अपने सपनों को छोटा करने के लिए कहा जाता है. उनकी सफलता की कहानी गर्व की बात है क्योंकि वह कई युवा मुस्लिम लड़कियों को अपने करियर की राह पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं. वह उनके लिए एक आदर्श हैं.
तैयबा की उपलब्धि इस बात की गवाही देती है कि दृढ़ता और दृढ़ संकल्प के साथ कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.
उनकी कहानी चीख-चीख कर कहती है कि; आकाश सीमा नहीं है, यह शुरुआत है.