संजीव भागवत
'शाहा मुतबजि ब्रह्माणी, जिनमे नाहिं मनमणि,
पंचीकरण का खोज किए, हिंदू-मुसलमान एक कर दिए,'
ऐसी रचनाओं के माध्यम से एकता के महत्व को व्यक्त करने वाले शाहा मुंतोजी बामणी (मृत्युंजय) ने मध्यकालीन मराठी संत साहित्य में महान योगदान दिया. वह एक अवलिया संत थे जिन्होंने पंचीकरण शब्दकोश की रचना की, जिसमें अध्यात्म, दर्शन, संगीत, ज्योतिष, योग आदि विषयों को शामिल किया गया.
शाहा मुंतोजी बामणी ने मराठी साहित्य जगत में विपुल रचनाएँ लिखीं. उनका मूल नाम मुर्तजा कादरी था. वे कादरी जैसे थे. उन्हें मृत्युंजय स्वामी, शाह मुतबाजी, ज्ञानसरनंद और ज्ञानसागर अय्या के नाम से भी जाना जाता है.
आनन्द सम्प्रदाय के सहजानन्द उनके गुरु थे. वे उन्हें मार देते हैं. ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति ने यह नाम दिया वह नाथ के समकालीन या बाद के और शिव से पूर्व के संत कवि थे. उनकी प्रमुख कृतियों में सिद्धसंकेतप्रबंध, अनुभवसार या अमृतसर, अद्वैतप्रकाश, स्वरूपसमाधान, प्रकाशदीप, जीवौद्धरण, पंचीकरण, गुरुलीला, पद, अभंग आदि शामिल हैं. अमृतानुभव नामक एक पुस्तक भी उनके नाम पर है.
उन्होंने दक्कनी हिंदी में पंचीकरण नामक पुस्तक लिखी. शोधकर्ताओं का कहना है कि उनका सिद्धसंकेत एक बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है और अधूरा होने के बावजूद, इसने जनमानस पर बहुत प्रभाव डाला. उन्होंने उस समय के विभिन्न प्रकार के दर्शनों को अविन्ध पंचीकरण, हिन्दू-इस्लामिक दर्शन-परिभाषकोश और प्रकाशदीप जैसे अपने लेखन के माध्यम से प्रस्तुत किया. वारकरी संप्रदाय के साथ-साथ वे नागेश, आनन्दया, नाथ और लिंगायत जैसे संप्रदायों के विचारों से भी प्रभावित थे. वहां से उन्होंने एक ऐसा दर्शन प्रस्तुत किया जो भेदभाव को कम करेगा और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देगा.
सिद्ध संकेत ग्रंथ में संत मुंतोजी की योग पर टिप्पणी से उनके नाथ संप्रदाय से जुड़ाव का पता चलता है, जबकि ज्ञानेश्वरी के प्रति उनका आदर उनकी अनेक रचनाओं में समय-समय पर स्पष्ट होता रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ रचनाओं पर विवेक सिंधु का भी प्रभाव रहा है. उनकी समग्र रचनाओं में हिंदू-मुस्लिम एकता की भूमिका स्पष्ट है. शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके द्वारा बनाया गया शब्दकोश उनका सबसे बड़ा योगदान है. उनका साहित्य मुख्यतः डॉ. यू. एम. पठान, डॉ. निवासी. ठोड़ी. ढेरे, डॉ. श. जाना. टुलपुले और अन्य लोगों ने विस्तार से लिखा है.
संत साहित्य के विद्वान डॉ. सतीश बडवे ने कहा, "संत मुंतोजी यानी मृत्युंजय स्वामी नाम हिंदू और मुस्लिम परंपराओं में एकता और समानता पैदा करने वाला है. उनके कार्यों का उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम विभाजन को खत्म करना है. उनका सिद्ध संकेत ग्रंथ अभी भी अपने पूर्ण रूप में उपलब्ध नहीं है; लेकिन उनके विविध कार्यों ने मराठी साहित्य की दुनिया में एक महान योगदान दिया है."
मुस्लिम संत साहित्य विद्वान प्रो. जावेश पाशा कुरैशी कहते हैं, "भारतीय संस्कृति संघर्ष से नहीं, बल्कि अच्छाई को स्वीकार करने की परंपरा से जन्मी है. इसकी अनेक परंपराएं और धाराएं हैं. मध्यकाल के सूफियों और संतों की भक्ति धारा एकता का अमृतकाल है. इस परंपरा ने ईश्वरीय संदेश को जमीनी स्तर के लोगों तक उनके घरों, खेतों, जंगलों और उनके कष्टों में पहुंचाया. संतों ने ईश्वर, अल्लाह को मंदिर और मस्जिद से बाहर निकालकर जन-जन तक पहुंचाने का अमूल्य कार्य किया है. इस दृष्टि से संत मुंतोजी का कार्य मूल्यवान है."