कहीं विकसित भारत’ के लक्ष्‍य से पिछड़ न जाएं

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 03-04-2025
Let us not fall behind in the pursuit of ‘Developed India’
Let us not fall behind in the pursuit of ‘Developed India’

 

anilडॉ. अनिल कुमार निगम

थाईलैंड-म्यांमार में आए विध्वंसकारी भूकंप के बाद भारत को इस पर चिंतन, मनन और मंथन की आवश्यकता है कि क्या हमारे देश की आबादी भूकंप के खतरे से सुरक्षित है. अगर दिल्‍ली-एनसीआर सहित देश के अन्‍य पहाड़ी  क्षेत्रों में भूकंप आता है तो उसका कितना घातक परिणाम हो सकता है. इसका सहज रूप से आकलन करना भी संभव नहीं है.

वास्तविकता तो भारत के पर्वतीय क्षेत्र ही नहीं बल्कि देश की राजधानी और एनसीआर के शहर बारूद के ढेर पर बैठे हैं. आज सरकार और देश की जनता को तंद्रा से उठकर इस समस्या से निपटने का समय आ चुका है. इस समस्या के प्रति अधिक उदासीनता हमको बहुत विकराल समस्या में फंसा सकती है.

भूकंप विज्ञानी पहले ही बता चुके हैं कि यदि दिल्‍ली-एनसीआर में तीव्र भूकंप आता है तो यहां के भवन उन झटकों को नहीं झेल पाएंगे. म्यांमार में आया भूकंप एक तरीके से भारत के लिए चेतावनी है कि वह देश भर में हो रहे प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और विकास के नाम पर किए जा रहे बेतरतीब निर्माण पर पुनर्विचार और आत्ममंथन करे.

भूकंप के लिहाज से दिल्‍ली-एनसीआर (Delhi-NCR) पहले ही सिस्मिक जोन-4 में दर्ज है.. वहीं यहां एक बड़ी आबादी आज घरों के बजाय फ्लैटों में रहती है. हाल ही में भूकंप विज्ञान विभाग की एक रिपोर्ट में बताया गया कि दिल्‍ली-एनसीआर के नोएडा, गुरुग्राम, गाजियाबाद, फरीदाबाद आदि शहरों में बड़ी संख्या में मौजूद फ्लैट और घर भूकंप के तेज झटकों को नहीं झेल सकते.

भूविज्ञानियों के अनुसार भारतीय प्लेट हर साल लगभग 5 सेमी की गति से उत्तर की ओर खिसक रही है.. यूरेशियन प्लेट के नीचे जा रही है. यह सतह के नीचे बहुत तेजी से तनाव पैदा कर रहा है, जिससे कभी भी तबाही मचाने वाला भूकंप आ सकता है.

तिब्बत में आने वाले छोटे-बड़े झटके इस बात के संकेत हैं. यह क्षेत्र एक बड़े भूकंप की ओर बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भूकंप की तीव्रता 8.5 से 9.0 रहती है, तो यह हिमालयी राज्यों के साथ-साथ पूरे उत्तर भारत में भयानक तबाही कर सकता है..

ध्यातत्व है कि देश की राजधानी दिल्ली से सटे एनसीआर के शहरों में हाई राइज बिल्डिंग बन चुकी हैं. इनके बनने का सिलसिला जारी है. यहां कुछ ही हाई राइज बिल्डिंग हैं जो मानकों के अनुरूप यानि भूकंप रोधी बनाई गई हैं.

ज्यादातर निर्माण बिना मानकों के किया गया है.. इसके अलावा इन शहरों में बहुत अधिक संख्या में अवैध निर्माण भी किया गया है. एक बहुत बड़ी आबादी इन अवैध तरीके से बनाए गए भवनों में रहती है अथवा कमर्शियल भवनों में काम करती है-

जिस दिन म्यांमार में भूकंप आया उसी दिन उत्तराखंड के चमोली में भी 3.2 तीव्रता  का भूकंप महसूस किया गया. इस वर्ष 15 मार्च से 29 मार्च के बीच जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर पूर्वोत्तर तक के हिमालयी राज्यों में 17 और तिब्बत में 8 भूकंप के झटके आए.

दरअसल, ये झटके इस बात का संकेत हैं कि भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और खासकर हिमालय का भूगर्भ अशांत है. केवल हिमालय ही नहीं, बल्कि अफगानिस्तान तक हिंदू कुश का भूगर्भ भी बेचैन है. भूविज्ञानी इसका कारण धरती के अंदर जमा हो रही भूगर्भीय ऊर्जा को मानते हैं. यह ऊर्जा बाहर आने के लिए मचल रही है..

वर्ष 2001 में आए भुज भूकंप (6.9 तीव्रता) और वर्ष 1993 के लातूर भूकंप (6.4 तीव्रता) में हजारों लोगों की मौत हुई थी. जांच में पता चला था कि वहां की निर्माण शैली भूकंपरोधी नहीं थी.

हालांकि वर्ष 1991 में उत्तरकाशी (6.6 तीव्रता) और 1999 में चमोली (6.8 तीव्रता) में आए भूकंपों के दौरान मृतकों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम रही. उत्तरकाशी में लगभग 700 और चमोली में 103 लोगों की जानें गईं, जबकि भूकंप की तीव्रता लगभग समान थी.

इसका प्रमुख कारण था कि हिमालय क्षेत्रों में घर अपेक्षाकृत हल्की सामग्री से बने थे, जिससे क्षति कम हुई. कहने का आशय है कि यदि निर्माण कार्य वैज्ञानिक तरीकों से किए जाएं, तो भूकंप से होने वाली क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

सचाई है कि हिमालयी क्षेत्र में 100 वर्षों से कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है. 1897 में असम (8.1 तीव्रता), 1905 में कांगड़ा (7.8 तीव्रता), 1934 में बिहार-नेपाल (8.0 तीव्रता) और 1950 में असम-तिब्बत (8.6 तीव्रता) के बाद इस क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है.

इस वजह से पिछले एक सदी में यहां विशाल मात्रा में भूकंपीय ऊर्जा जमा हो चुकी है. माना जाता है कि जब यह ऊर्जा बाहर आएगी, तो हिमालयी क्षेत्र में भारी विनाश हो सकता है.

हजारों इमारतें, पुल और सड़कें ध्वस्त हो सकती हैं. ग्लेशियर टूट सकते हैं . बड़े पैमाने पर भूस्खलन और बाढ़ आ सकते हैं. टिहरी और भाखड़ा नंगल जैसे बांध खतरे से बाहर नहीं हैं. उत्तर भारत में जल प्रलय की स्थिति भी पैदा को सकती है.

भूकंप ऐसी प्राकृतिक घटना है जिसे रोकना संभव नहीं है. लेकिन इस स्थिति को देखते हुए भारत को अविलंब नींद से जागने की आवश्यकता है. भूकंपरोधी निर्माण नियमों को अत्‍यंत सख्ती से लागू करना होगा.

अवैध तरीके से बनने वाली इमारतों को तुरंत रोकना चाहिए. पुरानी इमारतों को मजबूत करना होगा और नई इमारतों को वैज्ञानिक मानकों के अनुसार बनाना होगा. आपदा प्रबंधन को अधिक सशक्त बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों से सुसज्जित करना होगा.

भूकंप पूर्वानुमान प्रणाली को विकसित करने पर ध्‍यान चाहिए. लोगों को प्रशि‍क्षित करने के उददेश्‍य से स्कूलों, कॉलेजों और दफ्तरों में भूकंप सुरक्षा प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए.

यह कार्य सिर्फ सरकार का नहीं है. इसमें आम जनता को सहयोग करना चाहिए. अगर समय रहते इस गंभीर समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो वर्ष 2047 में विकसित भारत बनाने का हमारा सपना कहीं अधूरा न रह जाए.
 
(लेखक स्‍वतंत्र टिप्पणीकार हैं..)