प्रमोद जोशी
उम्मीद पहले से थी कि राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठने के बाद डॉनल्ड ट्रंप यूक्रेन की लड़ाई को रुकवाने के लिए हस्तक्षेप करेंगे, पर सब कुछ इतनी तेजी से होगा, इसका अनुमान नहीं था. दुनिया ‘मनमौजी’ मानकर उनकी बातों की अनदेखी करती रही है, पर अब सब मज़ाक नहीं लग रहा है.
इस हफ्ते दुनिया यूक्रेन की लड़ाई के तीन साल पूरे हो रहे हैं. इस लड़ाई में करीब दस लाख लोग मारे गए या घायल हुए हैं, जिससे यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे खूनी यूरोपीय युद्ध बन गया है. यह लड़ाई गहरे धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक संबंधों की कहानी कहती है, पर इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को जो घाव लगाए हैं, उन्हें भरने की जरूरत है.
अगले कुछ दिनों में नज़र आने लगेगा कि वैश्विक-राजनीति में अमेरिका और रूस एक-दूसरे के साथ खड़े हैं. सवाल है कि क्या चीन की भी इसमें कोई भूमिका होगी या चीन का दबदबा रोकने की यह कोशिश है? सामने की बातों में तो चीन ने अमेरिकी पहल की तारीफ की है.
लगता है कि बहुत कुछ उल्टा-पुल्टा होने वाला है. भारत को ऐसे में अपने हितों की रक्षा करनी होगी. इस लड़ाई के दौरान भारत ने अपने दीर्घकालिक संबंधों को देखते हुए रूस की निंदा करने से परहेज किया.
शतरंज की बाज़ी
पिछली 12फ़रवरी को ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच डेढ़ घंटे तक चली फ़ोन-वार्ता ने अमेरिका-रूस के बीच रिश्तों की एक नई शुरुआत कर दी है. उसके बाद 18फरवरी को, अमेरिका और रूस के मंत्रियों और अधिकारियों का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल सऊदी अरब के रियाद में मिला, जो यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद दोनों देशों के बीच पहला व्यक्तिगत संपर्क था.
इस बातचीत को लेकर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की से राय-मशविरा भी नहीं किया गया और न उन्हें बुलाया गया. असली मसला कुछ और है. यह राजनयिक-प्रयासों से ज्यादा शतरंज की ऐसी बाज़ी है, जिसमें एक खिलाड़ी को नियमों का पता नहीं है और दूसरा अपने नियम बना रहा है.
ट्रंप ने कहा है कि इस महीने का अंत होते-होते पुतिन से मेरी मुलाकात भी हो सकती है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों आज इस सिलसिले में अमेरिका पहुँचे हुए हैं. ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर भी वहाँ पहुँच रहे हैं.
इरादा क्या है?
सवाल है कि ट्रंप को क्या अमेरिकी जनता का अपार समर्थन हासिल है? शायद वे मानते हैं कि अमेरिकी जनता ने उन्हें सब कुछ बदल देने का आदेश दिया है. कुछ पर्यवेक्षक यह भी मानते हैं कि ट्रंप प्रशासन के पास कोई रणनीति नहीं है, केवल आवेग है: चलो युद्ध रोकें, रूसियों से बात करें वगैरह.
ट्रंप भले ही ‘मनमौजी’ लगते हों, पर राष्ट्रपति यों ही नहीं बन गए हैं. इन बातों के पीछे कोई नज़रिया भी है. कम से कम इस बात से ज्यादातर लोग सहमत हैं कि लड़ाई रुकनी चाहिए. वाशिंगटन और मॉस्को के बीच सीधा संवाद भी ठीक है, पर लगता है कि ट्रंप-प्रशासन ने बातचीत शुरू होने से पहले ही सब कुछ तय कर लिया है.
उन्होंने यूक्रेन की नाटो-सदस्यता की संभावनाओं को खत्म कर दिया है, वे यह भी कह रहे हैं कि यूक्रेन को 2014की सीमाओं को छोड़ देना चाहिए, वहाँ अमेरिकी सेना तैनात नहीं होगी. एक तरफ जहाँ रूस पर आर्थिक पाबंदियाँ अभी लागू हैं, वहीं व्यापार संबंधों को फिर से शुरू करने की बातें हो रही हैं.
सवालों के घेरे
बात केवल रूस-अमेरिका संवाद तक सीमित नहीं रहेगी. उसके साथ पश्चिम एशिया, ऊर्जा सुरक्षा, आर्कटिक, सामरिक स्थिरता, और प्रशांत क्षेत्र जैसे दूसरे मसले भी जुड़ेंगे. रूस साधारण युद्ध-विराम नहीं चाहता, दीर्घकालीन समझौता चाहता है. ऐसा समझौता, जिसमें संघर्ष के मूल कारणों का समाधान हो.
इसका मतलब है कि वह ज़मीन जिसे वह रूसी-संप्रभु क्षेत्र मानता है, हमेशा के लिए यूक्रेन के हाथ से चली जाए. भविष्य में भी पुतिन पूरे यूक्रेन को नियंत्रित करना चाहते हैं. यानी कि यूक्रेन की घरेलू राजनीति में वे दखल चाहेंगे.
यूरोपीय देश चाहते हैं कि संप्रभु, स्वतंत्र यूक्रेन को संरक्षण दिया जाए. उधर ट्रंप यूक्रेन की जनता से कह रहे हैं कि हम आपसे बात कर सकते हैं, आपके राष्ट्रपति से नहीं, पर क्या ज़ेलेंस्की को हाशिए पर डाला जा सकता है?
वैचारिक ध्रुवीकरण
दुनिया में इस समय उदारवाद, वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच टकराव है. यह टकराव यूरोप में मुखर हो रहा है. ब्रिटेन में स्टार्मर की लेबर पार्टी चुनाव जीत गई, पर उसके बाद उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट देखी जा रही है. फ्रांस, जर्मनी, रोमानिया और दूसरे देशों में भी हवा का रुख बदल रहा है.
ज़ेलेंस्की ने ट्रंप का उपहास उड़ाते हुए कहा है कि वे रूस की गलत सूचना के बुलबुले" में फँस गए हैं. जवाब में ट्रंप ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि ज़ेलेंस्की एक मामूली कॉमेडियन और जनादेश पाए बगैर तानाशाह बने बैठे हैं. उन्हें यह लड़ाई कभी शुरू नहीं करनी चाहिए थी.
स्तब्ध यूरोपीय नेता पहले 17फरवरी को पेरिस में और फिर 19को ट्रान्स अटलांटिक साझेदारी के भविष्य पर चर्चा करने के लिए जमा हुए. 1945के बाद की शुरू हुई यह साझेदारी शीत युद्ध के दौरान फलीभूत हुई. अमेरिकी छतरी के नीचे यूरोप फला-फूला.
राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन के विदेशमंत्री जॉर्ज सी मार्शल के नाम पर मार्शल योजना के माध्यम से अमेरिका ने पश्चिमी और दक्षिणी यूरोप के देशों की बिखरी हुई अर्थव्यवस्थाओं को फिर से खड़ा करने में मदद की थी.
नाटो की प्रासंगिकता
1991में सोवियत संघ के विघटन के साथ नाटो के अस्तित्व का उद्देश्य समाप्त हो जाने के बाद भी यह साझेदारी कायम रही. 1सितंबर, 2001को अमेरिका पर हुए हमलों के बाद आतंकवाद के खिलाफ युद्ध ने इस गठबंधन को फिर से जगाया.
जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और दूसरे यूरोपीय देशों के सैनिकों ने अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएसएएफ) के झंडे तले 2001से 2014तक अफगानिस्तान में अल कायदा और तालिबान से लड़ाई लड़ी. अब शायद सब बदलने जा रहा है.
कुछ विश्लेषक इन गतिविधियों की 1945के याल्टा सम्मेलन से तुलना कर रहे हैं, जब अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन के नेता युद्ध के बाद के जर्मनी और यूरोप के भविष्य पर चर्चा करने के लिए मिले थे.
गतिविधियाँ कई सतहों पर चल रही हैं. अमेरिका के रक्षामंत्री पीट हैगसैथ ने ब्रुसेल्स में यूक्रेन रक्षा संपर्क समूह से कहा कि आप पहले इस बात को मानें कि यूक्रेन की 2014से पहले की सीमाओं पर वापसी अवास्तविक है. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका नहीं मानता कि यूक्रेन के लिए नाटो की सदस्यता ज़रूरी है.
उधर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में यूरोपीय नेताओं से कहा कि यूरोप को खतरा रूस से नहीं, बल्कि अंदर से है. अगर आप अपने ही वोटरों से डर रहे हैं, तो अमेरिका आपके लिए कुछ नहीं कर सकता.
भारत का दृष्टिकोण
अब स्वाभाविक सवाल है कि इन गतिविधियों को भारत किस रूप में देख रहा है. ऐतिहासिक रूप से भारत किसी भी देश का पिछलग्गू नहीं है. हमारे रिश्ते अमेरिका से बेहतर रहें, इसमें कोई खराबी नहीं, पर हमें ईरान, रूस और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी संबंध बनाकर रखने हैं.
हाल में क़तर के अमीर शेख़ तमीम बिन हमाद अल-थानी की यात्रा को भी इस वैश्विक-अंतर्मंथन के दृष्टिकोण से देखना चाहिए. इस बीच ट्रंप की ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ की पेशबंदी भी ज़रूरी है. ट्रंप चाहते हैं कि भारत अमेरिका से प्राकृतिक गैस खरीदे. इस समय भारत सबसे ज्यादा गैस क़तर से ख़रीदता है. हमें वही करना होगा, जो हमारे हित में है.
हाल में रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास को प्रधानमंत्री का दूसरा प्रिंसिपल सेक्रेटरी नियुक्त करना भी अनायास नहीं है. संभावित टैरिफ-वार्ताओं की तैयारी के लिहाज से यह नियुक्ति महत्वपूर्ण है.
पिछले गुरुवार को जोहानेसबर्ग में जी-20की बैठक के हाशिए पर विदेशमंत्री एस जयशंकर ने रूसी विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात के बाद कहा, यूक्रेन संघर्ष के संबंध में, हम लंबे समय से बातचीत की वकालत करते रहे हैं. आज, दुनिया को उम्मीद है कि ‘संबद्ध-पक्ष’ युद्ध को समाप्त करने के लिए एक-दूसरे के साथ समझौता करेंगे.
उनके बयान में ‘संघर्ष के दो पक्षों’ के बजाय ‘संबद्ध-पक्षों’ का उल्लेख है. यह व्यापक शब्द है और इसमें यूरोप के साथ या उसके बिना अमेरिका भी शामिल हो सकता है.
हाल में दिल्ली स्थित थिंकटैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की तरफ से आयोजित एक चर्चा में उन्होंने कहा, ‘मैं नहीं कर रहा कि अच्छा होगा या बुरा…मैं केवल अनुमान लगा रहा हूँ कि क्या होने वाला है. मुझे लगता है कि आने वाले समय में कुछ बड़ा होने वाला है.’
रूस से संपर्क
भारत की नीतियों को मुड़कर देखें, तो कुछ बातें समझ में आएँगी. पिछले साल जून में स्विट्ज़रलैंड में आयोजित शांति सम्मेलन में भारत ने संयुक्त विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. भारत का तर्क था कि वार्ता में रूस शामिल नहीं है.
पिछले तीन वर्षों में भारत ने चीन से दूरी ज़रूर बनाकर रखी है, पर रूस के साथ द्विपक्षीय स्तर पर और जी-20, एससीओ और ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों पर संपर्क बनाकर रखा है. आज की स्थिति में यह बात भारत को बेहतर स्थिति में रखेगी. भारत की एक नज़र चीन पर भी होगी कि शांति-वार्ता को लेकर उसका विचार क्या है.
इस हफ्ते यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन अपने मंडल के साथ 27-28फरवरी को नई दिल्ली आ रही हैं. यह पूर्व-निर्धारित दौरा बदली हुई परिस्थितियों में हो रहा है. कुल मिलाकर विचार-मंथन वहाँ हो रहा है, तो यहाँ भी होगा.
(लेखक दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक रहे हैं)