मलिक असगर हाशमी
विष्णु और बुद्ध की धरती 'गया' में ट्रेन से उतरते ही सबसे पहला ख्याल ईद पर अपने दोस्तों को खाने पर बुलाने का आया. लेकिन यह ध्यान नहीं रहा कि नवरात्र शुरू हो चुके हैं, और मेरे दोस्त इन दिनों मांस-मच्छली तो छोड़िए, लहसुन-प्याज तक से दूर रहते हैं.
स्टेशन से घर पहुंचकर अब्बा-अम्मा से मिला. करीब घंटेभर तक बातचीत हुई.इस बीच सुबह की पहली किरणें आसमान में फैल चुकी थीं. हमारे भाई-भतीजे सेहरी के बाद फज्र की नमाज पढ़कर मस्जिद से घर लौट चुके थे.
इसके बाद, पहली फुर्सत में मैंने अपने दोस्त कमल नयन को फोन लगाया. वह एक अखबार में जिम्मेदार पद पर हैं और देर रात तक काम करने के बाद अक्सर दिन चढ़े तक सोते हैं. फिर भी, मैंने इस बात का ख्याल न रखते हुए उनके मोबाइल की घंटी बजा दी.
तस्वीर में जितेन्द्र , कमल,रूपक,शिव शंकर, विमलेंदु
उधर से नींद से भरी आवाज आई—''आ गए दिल्ली से?''
मैंने कहा, ''हां, आ गया हूं और संभवतः सोमवार को ईद होगी. इसलिए तुम्हें दोपहर के खाने पर आना है.थोड़ी देर में बाजार जाकर दावत की तैयारी करूंगा.''इतना सुनते ही जैसे कमल की नींद गायब हो गई.
उसने तुरंत जवाब दिया—''सुनो, हमनी के चैती छठ चल रहल बा. नवरात्र भी हो. हम दस दिन तक बाहर के कुच्छो न खाइबो.'' फिर थोड़ी देर ठहरकर बोला—''ईदवा के दिन तोहरा घर जरूर आइबो, पर खाईबो ना..सिर्फ सेल्फी लेकर सीधे दफ्तर चल जाइबो.''
कमल की बात सुनकर मैं भी जैसे नींद से जाग गया. मन में ख्याल आया कि मैंने इस बारे में पहले क्यों नहीं सोचा? दरअसल, ईद की दोपहर हमारे सर्कल के तमाम गैर-मुस्लिम दोस्तों का घर पर जमघट लगता था.
जब तक गया में रहा, यह सिलसिला चलता रहा. फिर नौकरी के सिलसिले में गुरुग्राम शिफ्ट होने के कारण यह क्रम टूट गया. जब कभी दिल्ली से गया ईद मनाने आता, तब दोपहर में दोस्तों की दावत जरूर होती.
शिकवे-शिकायतों का दौर चलता, पारिवारिक बातें होतीं, राजनीति पर चर्चा होती, एक-दूसरे की खिंचाई होती, और घंटों यह सिलसिला चलता.फिर सभी खा-पीकर गले मिलते और अगली ईद पर मिलने का वादा करके अपने-अपने घर लौट जाते.
बाएं से पंकज सिन्हा, बिल्कुल दाएं बिमलेंदु.दोनों तस्वीरें पांच साल पुरानी ईद के दिन की है.
हालांकि, वर्षों के इस सिलसिले के बीच हमारे कई साथी—प्रभात शांडिल्य, भगवान श्रीभास्कर सहित चार मित्र दुनिया छोड़ चुके हैं. इसलिए हम किसी न किसी बहाने मिलने की कोशिश करते हैं, और पर्व-त्योहार इसके लिए सबसे अच्छा जरिया होता है.
लेकिन कमल के चैती छठ और नवरात्र की ओर ध्यान दिलाने पर मैं मायूस हो गया. सोचा, अगर दोस्तों को बुलाता भी हूं तो वे कमल की तरह केवल चंद सेकंड के लिए आएंगे, बिना खाए-पीए सेल्फी लेंगे और चले जाएंगे.
यही सोचकर मैंने इस समस्या का जिक्र अपनी पत्नी से किया. उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद जो सुझाव दिया, वह मुझे ही नहीं, बाद में हमारे सभी दोस्तों को भी पसंद आया—''ईद पर नवरात्र.''
पत्नी से मशविरा करने के बाद मैंने फिर कमल को फोन लगाया—''सुनो, हम खुलकर ईद मनाएंगे, और सिर्फ सेल्फी से काम नहीं चलेगा. ईद की पार्टी होगी..' फिर बारी-बारी से विम्लेंदु, जितेंद्र, रूपक, बलराम शर्मा, लालजी बाबू, पंकज सिन्हा आदि को फोन किया और आइडिया साझा किया।.सभी योजना सुनकर उत्साहित हो गए और आने की हामी भर दी.
मेरे एक दोस्त चंदन, जो कभी 'सहारा' में बिहार के संपादक थे और अब 'नवभारत टाइम्स' के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं, इन दिनों गया आए हुए हैं. जब उन्हें रूपक से ईद पार्टी की बात पता चली, तो उन्होंने भी तुरंत आने की सहमति दे दी.
गले मिलकर लेखक और कमल नयन में खूब हुई ठिठोली
ईद के दिन...
नमाज पढ़कर पहले अपने परिवार से मिला, फिर मीठी सिवइयां, दही-भल्ले और रोटी खाई. इसके बाद, छोटे बेटे के साथ पार्टी की तैयारी के लिए बाजार निकल गया. केदारनाथ मार्केट से खरीदारी कर घर लौटा और सामान पत्नी को सौंप दिया. फिर घर के निचले हिस्से में दोस्तों के बैठने की व्यवस्था करने में लग गया..
डेढ़ बज चुका था. दावत का समय दोपहर दो बजे था, लेकिन दोस्तों के आने का सिलसिला सवा दो बजे से शुरू हुआ. सबसे पहले लालजी प्रसाद आए, जो जनता दल यूनाइटेड के संस्थापक सदस्य और प्रसिद्ध समाजसेवी हैं. उनके बाद जितेंद्र आए, फिर धीरे-धीरे सभी दोस्त इकट्ठे हो गए.
बैठक शुरू हुई और वही पुरानी बातें—शिकवे-शिकायतें, टांग-खिंचाई, राजनीति पर चर्चा और पुराने दिनों की यादें ताजा होने लगीं. हमने उन साथियों को भी याद किया, जो अब हमारे बीच नहीं रहे.
शहर के कई नामचीन लोगों का जिक्र आया, जिनका जीवनकाल गया में प्रभावशाली रहा. उनमें से एक, एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी स्कूल के संस्थापक भी थे, जिनका बेटा अमेरिका में रहता है और स्कूल अब केयरटेकर के सहारे चल रहा है.
कई घंटे कब बीत गए, पता ही नहीं चला.इस बीच, सभी के मन में एक ही सवाल तैर रहा था—''खाने में क्या परोसा जाएगा?''
इतने में मेरा छोटा बेटा कमरे में आया और बोला, ''मम्मी पूछ रही हैं, खाना लगाऊं क्या?''
मैंने दोस्तों की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा, ''ले आओ!''
यह सुनते ही कुछ सेकंड के लिए कमरे में खामोशी छा गई.फिर बेटा शीशे की कटोरियां, चम्मच, ठंडे पानी की बोतलें और प्लेटें लाने लगा। अंत में, तरह-तरह के फलों से सजी थालियां सामने आईं—तरबूज, केला, सेब, कीवी, स्ट्रॉबेरी, पपीता, काले और हरे अंगूर.
यह देखकर सभी दोस्तों के चेहरे खिल उठे। किसी ने उत्साहित होकर कहा—''यह ईद जीवन भर याद रहेगी। नवरात्र में ईद!''
फिर सभी ने बिना झिझक भरपेट फलाहार किया. गले मिले, एक-दूसरे को इत्र लगाया और फिर कुछ देर और गपशप की. इस दौरान, विम्लेंदु ने सभी की तस्वीरें लीं। वह कई टीवी चैनलों के लिए फ्रीलांस करता है.
चलते-चलते कमल नयन धीरे से बोला, ''घर में चैती छठ हो रही है.पूरा परिवार आया हुआ है. चार अप्रैल को तुम्हें घर जरूर आना.छोटे भाई नीलू का बेटा गुरुग्राम में काम करता है, वह भी तुमसे मिलना चाहता है.''
इसके बाद, सभी अपने-अपने वाहनों से लौट गए. मैं भी भीतर से संतुष्ट था कि इस बार ईद को एक नए और यादगार अंदाज में मनाया.दरअसल, भगवान विष्णु की यह मोक्ष और गौतम बुद्ध की ज्ञान भूमि है, जहां हर मस्ले का हल लोग बिना किसी लंबी जिरह के आसानी से निकाल लेने के आदी हैं.