फरहान इसराइली / जयपुर
मिर्ज़ा इस्माइल एक ऐसे भारतीय राजनेता थे, जो अपनी प्रशासनिक दक्षता के कारण भारतीय रजवाड़ों की पहली पसंद हुआ करते थे.उन्होंने अंग्रेजों के समय देश की तीन बड़ी रियासतों में प्रधानमंत्री/दीवान के रूप में कार्यभार संभाला.
रियासतों के विकास में अहम् भूमिका निभाई.इनका परिवार फारस (ईरान) से भारत में रिफ्यूजी के तौर पर आया था.मिर्ज़ा मैसूर के राजा कृष्णराय के साथ कॉलेज में पढ़ते थे . अच्छे दोस्त थे.1926में इन्हें मैसूर दीवान का पद सौंपा गया.
मिर्ज़ा ने मैसूर दीवान रहते हुए औद्योगिक विकास को गति दी.उनके कार्यकाल में चीनी मिट्टी के बर्तनों, ग्लास, कागज, सीमेंट और बिजली के बल्ब के कारखाने स्थपित किये गए.
मैसूर रियासत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए लंदन में एक व्यापार आयुक्त भी नियुक्त किया.इसके बाद कई राजाओं ने उन्हें प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने का आग्रह किया.
मिर्ज़ा ने जयपुर के राजा सवाई मानसिंह-द्वितीय के आग्रह को स्वीकार करते हुए 1942में एक साल के लिए जयपुर का प्रधानमंत्री बनना स्वीकार किया, जिसे बाद में बढ़ा कर तीन साल कर दिया गया.
जब उन्हें जयपुर का प्रधानमंत्री बनाने का फैसला लिया गया, तो राजपूत ठाकुरों और जागीरदारों ने नाराजगी जाहिर की.उन्हें एक मुस्लिम का उनकी रियासत का प्रधानमंत्री बनना स्वीकार्य नहीं था.लेकिन जयपुर के राजा सवाई मानसिंह द्वितीय ने किसी की नहीं सुनी.मिर्ज़ा की काबिलियत देखते हुए उन्हें पद पर बैठाया.
मोहमद अली जिन्ना चाहते थे कि मिर्ज़ा उनके साथ पाकिस्तान चले जाएं .पाकिस्तान के निर्माण में मदद करें, लेकिन मिर्ज़ा ने बता दिया कि वे बंटवारे के पक्ष में नहीं.
इस बात को साबित करने के लिए उन्होंने 1946 में हैदराबाद के दीवान का पद स्वीकार किया.हैदराबाद चले गए.हैदराबाद के भारत में विलय पर मिर्ज़ा ने निज़ाम मीर उस्मान अली खान के पक्ष को भारत सरकार के सामने बहुत अच्छे से रखा.लेकिन जब उन्होंने देखा कि निज़ाम धीरे धीरे भारत में विलय के विरुद्ध जा रहा है तो उन्होंने दीवान के पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
जयपुर को बनाया खूबसूरत
जयपुर का प्रसिद्ध गवर्मेंट हॉस्टल यानी आज का पुलिस कमिश्नर ऑफिस कभी मिर्ज़ा इस्माइल का ऑफिस यानी प्रधानमंत्री कार्यालय हुआ करता था.चौड़ा रास्ता के नुक्कड़ पर पहले न्यू गेट नहीं बल्कि परकोटा हुआ करता था.
मिर्ज़ा ने परकोटा तुड़वा कर वहां गेट बनवा दिया.रामनिवास बाग़ के पेड़ कटवा कर वहां सड़क बनवा दी.आज यह सड़क जवाहर लाल नेहरू मार्ग के नाम से जानी जाती है.
मिर्ज़ा को शहर के दक्षिणी भाग की विकास की जिम्मेदारी दी गई.उन्होंने A,B,C,D, E की स्कीमें काटी.ए. स्कीम में फतेह टिब्बा, बी. स्कीम में मेडिकल कॉलेज और गंगवाल पार्क, सी स्कीम में न्यू काॅलोनी और जालुपरा और ई स्कीम के अन्तर्गत बनीपार्क का विकास किया गया.
अजमेरी गेट से रेलवे स्टेशन तक नई सड़क का निर्माण करवाया, जिसे आज मिर्ज़ा इस्माइल रोड (एम आई रोड) कहा जाता है.एक बड़े चौराहे का निर्माण करवा कर उसके चारों और शहर के बड़े रईसों जयपुरिया, ठोलिया, कासलीवाल परिवारों के भवनों को बंगलौर की तर्ज पर बनाया गया.
इसका नाम पांच बत्ती रखा गया.जयपुर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना का श्रेय मिर्ज़ा को जाता है.मिर्ज़ा की पहुँच तत्कालीन वायसराय लार्ड लेवल तक थी.मिर्ज़ा ने उन्हें जयपुर आ कर मेडिकल कॉलेज की नींव रखने के लिए मना लिया.
उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर सुधारने के लिए मैसूर के फेमस जर्मन डॉक्टर हेलिग को बुलवा लिया, जिन्होंने जयपुर का सवाई मानसिंह अस्पताल संभाला.
उस समय अस्पताल का नाम लेडी हार्डिग हुआ करता था.राजस्थान विश्वविद्यालय की स्थापना में मिर्ज़ा इस्माइल का अहम् योगदान रहा है.पहले इसे राजपुताना यूनिवर्सिटी भी कहा जाता था.मिर्ज़ा ने मैसूर के प्रसिद्ध शिक्षाविद डॉ जे सी रोलो से निवेदन किया और उन्हें जयपुर आने के लिए मनाया.
इसके बाद दोनों ने यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए प्रयास शुरू किये.आज जयपुर की राजस्थान यूनिवर्सिटी को दुनिया भर में नाम है.देश विदेश से विद्यार्थी यहाँ पढ़ने आते हैं.
इस्माइल का मानना था कि राष्ट्रीय विकास के लिए विज्ञान आवश्यक है. उन्होंने 1932की भारतीय विज्ञान कांग्रेस के दौरान वैज्ञानिकों की एक सभा को बताया: “आप (वैज्ञानिकों), सज्जनों, एक महान खोज में लगे हुए हैं - सत्य की एकचित्त और अटूट खोज, जैसा कि प्रकृति आधा प्रकट करती है और आधा इसे छुपाती है.
कभी-कभी यह शोध उद्देश्य में व्यावहारिक होता है. कभी-कभी यह केवल सत्य की तलाश करता है. हमारा युग यह भूलने के लिए उपयुक्त है कि बाद वाला लक्ष्य श्रेष्ठ है; और सबसे श्रेष्ठ है खोज करने का परिश्रम और अनुशासन जो असफलता को भी आत्मा की विजय बना देता है."
मिर्ज़ा इस्माइल ने अपना आखिरी समय बंगलौर में बिताया.1959 में उनका निधन हो गया.जयपुर, मैसूर और हैदराबाद के विकास में मिर्ज़ा इस्माइल के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता.उन का जन्म 24अक्टूबर 1883में बैंगलोर में हुआ था.